योजना और विकास : Planning in India

भारत में योजना निर्माण (Planning in India) के बारे में जानें, जिसमें नीति आयोग की भूमिका, वर्तमान रणनीतियाँ और सतत विकास को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ शामिल हैं।”

परिचय

भारत जैसे विकासशील देश में आर्थिक नियोजन (Economic Planning) की अवधारणा बहुत महत्वपूर्ण रही है। आर्थिक नियोजन का अर्थ है—देश के सीमित संसाधनों का व्यवस्थित और योजनाबद्ध उपयोग करके आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और समग्र प्रगति सुनिश्चित करना। यह न केवल आर्थिक वृद्धि को गति देता है बल्कि गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन और असमानता को कम करने में भी सहायक होता है।

भारत में आर्थिक नियोजन के प्रकार

भारत में नियोजन को समयावधि और दृष्टिकोण के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में बाँटा गया है:

  1. दृष्टिकोण आधारित नियोजन (Perspective Planning) – लंबी अवधि की योजनाएँ
  • ये योजनाएँ 15–20 साल या उससे अधिक अवधि के लिए बनाई जाती हैं।
  • इसमें देश के दीर्घकालिक विकास की रूपरेखा तय की जाती है।
  • उदाहरण: भारत में “20-वर्षीय दृष्टिकोण योजना” (1961–1981) तैयार की गई थी।
  • इसका उद्देश्य केवल अल्पकालिक समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक संरचना तैयार करना होता है।

विशेषताएँ:

  • लंबी अवधि का दृष्टिकोण
  • बुनियादी ढांचे और औद्योगिकीकरण पर फोकस
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन विकास पर ध्यान
  1. पांच वर्षीय योजना (Five Year Plans) – मध्यम अवधि की योजनाएँ
  • इनका समयकाल 5 साल होता है।
  • स्वतंत्रता के बाद भारत ने सोवियत संघ से प्रेरणा लेकर पहली बार 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना शुरू की।
  • इन योजनाओं में विशिष्ट लक्ष्य तय किए जाते हैं, जैसे—कृषि विकास, औद्योगीकरण, गरीबी उन्मूलन, आत्मनिर्भरता आदि।

उदाहरण:

  • प्रथम योजना (1951–56): कृषि और सिंचाई पर जोर
  • द्वितीय योजना (1956–61): भारी उद्योग और औद्योगीकरण
  • बारहवीं योजना (2012–17): “तेज़, सतत और समावेशी विकास”
  1. वार्षिक एवं रोलिंग योजनाएँ (Annual and Rolling Plans) – अल्पकालिक योजनाएँ
  • इन योजनाओं का समयकाल 1 वर्ष या कुछ वर्षों का होता है।
  • मुख्य उद्देश्य तात्कालिक समस्याओं और आपातकालीन परिस्थितियों से निपटना है।

उदाहरण:

  • 1966–69 के बीच वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं, क्योंकि तीसरी योजना असफल हो गई और चौथी योजना तैयार नहीं हो पाई थी।
  • 1978–80 में रोलिंग योजना लागू की गई (मोरारजी देसाई सरकार), जिसमें हर साल अगले वर्षों के लिए नए लक्ष्य तय किए जाते थे।

भारत में आर्थिक नियोजन के प्रमुख उद्देश्य

भारत में आर्थिक नियोजन के उद्देश्य केवल आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक लक्ष्यों को भी शामिल किया गया। मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:

  1. तीव्र आर्थिक विकास
  • स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था बहुत पिछड़ी हुई थी।
  • योजनाओं का पहला लक्ष्य था उच्च दर से आर्थिक विकास करना।
  • कृषि उत्पादन, औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे का विस्तार करके GDP वृद्धि दर बढ़ाना।
  1. सामाजिक न्याय और समानता
  • भारत में अमीरी-गरीबी और क्षेत्रीय असमानता बहुत गहरी थी।
  • योजनाओं का उद्देश्य था कि विकास का लाभ केवल शहरों और अमीरों तक सीमित न रहे।
  • सामाजिक न्याय लाने के लिए गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, भूमि सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया गया।
  1. रोजगार के अवसरों का सृजन
  • बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी समस्या थी और अब भी है।
  • योजनाओं ने रोजगार सृजन के लिए उद्योग, सेवा और कृषि क्षेत्र में निवेश पर बल दिया।
  • विशेष कार्यक्रम जैसे IRDP (Integrated Rural Development Programme), NREP (National Rural Employment Programme) शुरू किए गए।
  1. आधुनिकीकरण और तकनीकी प्रगति
  • भारत को पारंपरिक अर्थव्यवस्था से आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र में बदलने के लिए आधुनिकीकरण जरूरी था।
  • योजनाओं ने मशीनरी, विज्ञान और तकनीक, आईटी और डिजिटलाइजेशन पर ध्यान दिया।
  • हरित क्रांति और श्वेत क्रांति जैसे कार्यक्रम तकनीकी प्रगति के उदाहरण हैं।
  1. आत्मनिर्भरता और विदेशी निर्भरता में कमी
  • प्रारंभ में भारत विदेशी सहायता और आयात पर बहुत निर्भर था।
  • योजनाओं का उद्देश्य था कि भारत अपनी जरूरतों (खाद्यान्न, ऊर्जा, औद्योगिक वस्तुएं) में आत्मनिर्भर बने।
  • “मेक इन इंडिया” जैसे आधुनिक कार्यक्रम भी इसी उद्देश्य से जुड़े हैं।

भारत मे आर्थिक नियोजन का इतिहास (History of Economic Planning in India)

स्वतंत्रता से पहले

भारत में नियोजन की अवधारणा ब्रिटिश शासन के दौरान ही जन्म ले चुकी थी। उस समय भारत कृषि प्रधान और गरीब देश था, जहाँ संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो रहा था। कई बुद्धिजीवियों और नेताओं ने सोचा कि यदि देश के विकास के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए तो जनता की स्थिति सुधर सकती है।

1934 – एम. विश्वेश्वरैया और योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था

  • मैसूर राज्य के दीवान रहे एम. विश्वेश्वरैया ने 1934 में “Planned Economy for India” नामक पुस्तक लिखी।
  • इसमें उन्होंने औद्योगीकरण और नियोजित विकास का महत्व बताया।
  • उनका मानना था कि यदि भारत को आधुनिक राष्ट्र बनना है तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण और योजनाबद्ध नीति अपनानी होगी।

1938 – नेशनल प्लानिंग कमेटी (National Planning Committee)

  • 1938 में कांग्रेस के नेतृत्व में नेशनल प्लानिंग कमेटी का गठन हुआ।
  • इस समिति के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे।
  • इस कमेटी ने गरीबी हटाने, औद्योगीकरण, रोजगार और आर्थिक विकास के लिए योजनाबद्ध प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया।
  • हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इसके सुझावों को पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका।

1944 – बॉम्बे प्लान और गांधीवादी योजना

  • 1944 में देश के प्रमुख उद्योगपतियों (जैसे जे.आर.डी. टाटा, जी.डी. बिड़ला आदि) ने बॉम्बे प्लान तैयार किया।
  • इसमें निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों के सहयोग से औद्योगिक और आर्थिक विकास का रोडमैप दिया गया।
  • दूसरी ओर, गांधीवादी योजना (Shriman Narayan Agarwal द्वारा) सामने आई जिसमें ग्राम स्वराज, कुटीर उद्योग और विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था पर बल दिया गया।

इन सभी योजनाओं ने यह साफ कर दिया कि स्वतंत्र भारत को विकास के लिए योजनाबद्ध दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी।

स्वतंत्रता के बाद

योजना आयोग का गठन (1950)

  • स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने 1950 में योजना आयोग (Planning Commission) का गठन किया।
  • इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता था।
  • आयोग का मुख्य कार्य था:
    • राष्ट्रीय स्तर पर विकास योजनाएँ बनाना।
    • संसाधनों का आवंटन करना।
    • योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करना।

पांच वर्षीय योजनाओं की शुरुआत (1951)

  • 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना लागू की गई।
  • इसका उद्देश्य था—कृषि उत्पादन बढ़ाना, सिंचाई सुविधाएँ विकसित करना और खाद्यान्न की समस्या को हल करना।
  • इसके बाद भारत ने सोवियत संघ की तर्ज पर लगातार पांच वर्षीय योजनाएँ बनाईं।
  • हर योजना का अलग उद्देश्य और लक्ष्य होता था, जैसे औद्योगिकीकरण, गरीबी उन्मूलन, आत्मनिर्भरता और आधुनिकरण।

संक्षेप में:
स्वतंत्रता से पहले की योजनाएँ—जैसे विश्वेश्वरैया की पुस्तक, नेशनल प्लानिंग कमेटी, बॉम्बे प्लान और गांधीवादी योजना—भारत में नियोजन की नींव थीं।
स्वतंत्रता के बाद—योजना आयोग और पांच वर्षीय योजनाएँ—ने उस नींव को वास्तविक विकास की दिशा में बदला।

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योजना आयोग और नीति आयोग (Planning Commission and NITI Ayog) Planning in India

स्थापना

  • योजना आयोग का गठन 15 मार्च 1950 को किया गया।
  • इसका गठन कैबिनेट रेज़ोल्यूशन के द्वारा हुआ था, न कि संविधान या संसद के अधिनियम से।
  • इसका अध्यक्ष हमेशा प्रधानमंत्री होता था।

प्रमुख कार्य

  1. राष्ट्रीय योजनाएँ बनाना – पंचवर्षीय योजनाओं और दीर्घकालिक योजनाओं का मसौदा तैयार करना।
  2. संसाधनों का आवंटन – विभिन्न राज्यों और मंत्रालयों को आर्थिक सहायता और संसाधन उपलब्ध कराना।
  3. नीतियों का समन्वय – केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं को एक-दूसरे से जोड़ना।
  4. प्रगति की निगरानी – योजनाओं के कार्यान्वयन की समीक्षा और निगरानी करना।

विशेषताएँ

  • सोवियत संघ की Gosplan संस्था से प्रेरणा ली गई थी।
  • इसका काम केवल परामर्श और सुझाव देना नहीं था, बल्कि संसाधनों का सीधा आवंटन भी करना था।
  • योजना आयोग पर अक्सर आरोप लगे कि यह “टॉप-डाउन अप्रोच” अपनाता था, यानी दिल्ली में बैठकर राज्यों पर योजनाएँ थोपना।

समाप्ति

  • बदलते आर्थिक परिदृश्य, विशेषकर 1991 के बाद के उदारीकरण के दौर में योजना आयोग की प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगे।
  • 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे समाप्त करने की घोषणा की और इसकी जगह एक नई संस्था बनाने की बात कही।

नीति आयोग (NITI Aayog, 2015–वर्तमान)

स्थापना

  • 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग की जगह नीति आयोग अस्तित्व में आया।
  • इसका पूरा नाम है: National Institution for Transforming India (NITI Aayog)

प्रमुख उद्देश्य और कार्य

  1. थिंक टैंक की भूमिका – नीति आयोग स्वयं योजनाएँ नहीं बनाता बल्कि सरकार को सुझाव देता है।
  2. सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) – राज्यों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना ताकि योजनाएँ “वन-साइज़-फिट्स-ऑल” न होकर स्थानीय जरूरतों पर आधारित हों।
  3. प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) – राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना।
  4. सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का कार्यान्वयन।
  5. नीति अनुसंधान और नवाचार – डेटा आधारित रिसर्च, नीति सलाह और तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करना।

संरचना

  • गवर्निंग काउंसिल – प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं और सभी मुख्यमंत्री तथा केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक इसके सदस्य होते हैं।
  • मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) – केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त।
  • विशेषज्ञ और शोधकर्ता – नीति आयोग में पूर्णकालिक सदस्य, अंशकालिक सदस्य और डोमेन विशेषज्ञ शामिल होते हैं।

प्रमुख पहल

  • अटल इनोवेशन मिशन (AIM) – उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देना।
  • इंडिया @75 और इंडिया @2047 जैसे विज़न डॉक्यूमेंट तैयार करना।
  • राज्यों की परफॉर्मेंस ट्रैक करने के लिए SDG India Index और Health Index प्रकाशित करना।

मुख्य अंतर: योजना आयोग बनाम नीति आयोग

  • आधार
  • योजना आयोग
  • नीति आयोग
  • स्थापना
  • 1950
  • 2015
  • स्वरूप
  • योजनाएँ बनाना और संसाधन आवंटित करना
  • थिंक टैंक, नीति सुझाव और शोध करना
  • दृष्टिकोण
  • टॉप-डाउन (केंद्र से राज्यों तक)
  • बॉटम-अप (राज्यों की भागीदारी के साथ)
  • भूमिका
  • योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन
  • नीति निर्माण में सलाह, मॉनिटरिंग और इनोवेशन
  • सत्ता
  • संसाधनों का सीधा नियंत्रण
  • कोई वित्तीय शक्ति नहीं, केवल सुझाव और सहयोग

 निष्कर्ष:
योजना आयोग ने भारत की प्रारंभिक विकास यात्रा में अहम भूमिका निभाई, खासकर पांच वर्षीय योजनाओं के जरिये। लेकिन बदलते समय में इसकी सीमाएँ सामने आईं। नीति आयोग अधिक लचीला, सहभागी और आधुनिक दृष्टिकोण वाला संस्थान है, जो सहकारी संघवाद और नवाचार आधारित विकास पर जोर देता है।

भारत की पंचवर्षीय योजनाएँ (1951-2017) Planning in India

भारत में कुल 12 पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गईं। इसके बाद 2017 से पंचवर्षीय योजनाओं का दौर समाप्त हो गया और नीति आयोग (NITI Aayog) ने थिंक टैंक के रूप में नई भूमिका निभानी शुरू की।

पंचवर्षीय योजनाओं का सारांश (टेबल रूप में)

योजना

अवधि

मुख्य लक्ष्य / फोकस

प्रमुख उपलब्धियाँ / टिप्पणियाँ

प्रथम योजना

1951–56

कृषि और सिंचाई पर जोर

खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा, भाखड़ा नांगल जैसी सिंचाई परियोजनाएँ शुरू

द्वितीय योजना

1956–61

औद्योगीकरण, भारी उद्योग, समाजवादी पैटर्न

भारी उद्योगों (Bhilai, Rourkela, Durgapur स्टील प्लांट) की स्थापना

तृतीय योजना

1961–66

कृषि और उद्योग में संतुलन

हरित क्रांति की शुरुआत, लेकिन चीन युद्ध (1962) और पाकिस्तान युद्ध (1965) से प्रभावित

वार्षिक योजनाएँ

1966–69

अल्पकालिक योजना

सूखा और युद्ध के कारण तीसरी योजना विफल, तीन वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं

चौथी योजना

1969–74

आत्मनिर्भरता और स्थिरता

“ग्रोथ विद स्टेबिलिटी”, बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969)

पाँचवीं योजना

1974–79

गरीबी उन्मूलन और रोजगार

“गरीबी हटाओ” नारा, 20 सूत्रीय कार्यक्रम शुरू

रोलिंग योजना

1978–80

लचीली योजना

मोरारजी देसाई सरकार ने शुरू की, लेकिन ज्यादा सफल नहीं रही

छठी योजना

1980–85

गरीबी उन्मूलन, तकनीकी विकास

रोजगार, ऊर्जा और आईटी सेक्टर में सुधार

सातवीं योजना

1985–90

रोजगार, उत्पादन और आत्मनिर्भरता

श्वेत क्रांति और दूरसंचार क्षेत्र में प्रगति

वार्षिक योजनाएँ

1990–92

अंतरिम योजनाएँ

राजनीतिक अस्थिरता के कारण 2 साल की वार्षिक योजनाएँ

आठवीं योजना

1992–97

आर्थिक उदारीकरण और सुधार

LPG (Liberalization, Privatization, Globalization) नीतियाँ लागू

नौवीं योजना

1997–2002

विकास को समावेशी बनाना

केंद्र और राज्य की साझेदारी पर जोर

दसवीं योजना

2002–07

8% GDP वृद्धि का लक्ष्य

शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास पर जोर

ग्यारहवीं योजना

2007–12

“तेज़ और समावेशी विकास”

शिक्षा, रोजगार और ग्रामीण योजनाओं पर ध्यान

बारहवीं योजना

2012–17

“तेज़, सतत और समावेशी विकास”

8% वृद्धि का लक्ष्य, लेकिन हासिल नहीं हुआ

पंचवर्षीय योजनाओं का विस्तृत विवरण (बिंदुओं में)

  1. प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951–56)
  • फोकस: कृषि, सिंचाई और ऊर्जा
  • उपलब्धि: भाखड़ा नांगल परियोजना, खाद्यान्न उत्पादन में सुधार
  1. द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956–61)
  • फोकस: औद्योगिकीकरण और भारी उद्योग
  • महालनोबिस मॉडल अपनाया गया
  • उपलब्धि: स्टील प्लांट, मशीन निर्माण उद्योग की स्थापना
  1. तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961–66)
  • फोकस: कृषि और उद्योग में संतुलन
  • बाधा: 1962 का चीन युद्ध और 1965 का पाकिस्तान युद्ध
  • उपलब्धि: हरित क्रांति की शुरुआत
  1. वार्षिक योजनाएँ (1966–69)
  • वजह: तीसरी योजना की विफलता
  • फोकस: तात्कालिक संकट प्रबंधन
  1. चौथी पंचवर्षीय योजना (1969–74)
  • फोकस: आत्मनिर्भरता और स्थिरता
  • उपलब्धि: बैंकों का राष्ट्रीयकरण, हरित क्रांति का विस्तार
  1. पाँचवीं पंचवर्षीय योजना (1974–79)
  • फोकस: गरीबी उन्मूलन और रोजगार
  • नारा: “गरीबी हटाओ”
  • उपलब्धि: 20 सूत्रीय कार्यक्रम
  1. रोलिंग योजना (1978–80)
  • मोरारजी देसाई सरकार द्वारा शुरू
  • हर साल नए लक्ष्य तय करने की कोशिश, लेकिन अल्पकालिक
  1. छठी पंचवर्षीय योजना (1980–85)
  • फोकस: गरीबी उन्मूलन, रोजगार, ऊर्जा
  • उपलब्धि: तकनीकी प्रगति, आईटी सेक्टर का विकास
  1. सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985–90)
  • फोकस: रोजगार, उत्पादन, आत्मनिर्भरता
  • उपलब्धि: श्वेत क्रांति, दूरसंचार का विकास
  1. वार्षिक योजनाएँ (1990–92)
  • वजह: राजनीतिक अस्थिरता
  • दो साल तक वार्षिक योजनाएँ चलाई गईं
  1. आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992–97)
  • फोकस: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG नीति)
  • उपलब्धि: विदेशी निवेश और बाजार सुधार
  1. नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997–2002)
  • फोकस: समावेशी विकास
  • उपलब्धि: राज्यों की भूमिका बढ़ी
  1. दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002–07)
  • लक्ष्य: 8% GDP वृद्धि
  • उपलब्धि: शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार
  1. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007–12)
  • नारा: “तेज़ और समावेशी विकास”
  • उपलब्धि: शिक्षा, रोजगार और ग्रामीण योजनाओं पर बल
  1. बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012–17)
  • नारा: “तेज़, सतत और समावेशी विकास”
  • लक्ष्य: 8% GDP वृद्धि, लेकिन हासिल नहीं हुआ

भारत में आर्थिक नियोजन की उपलब्धियाँ

भारत में 1951 से 2017 तक चली पंचवर्षीय योजनाओं और नियोजन प्रक्रिया ने देश की आर्थिक और सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। इसकी मुख्य उपलब्धियाँ इस प्रकार रही:

  1. खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि
  • स्वतंत्रता के समय भारत को खाद्यान्न की भारी कमी का सामना करना पड़ता था और आयात पर निर्भर रहना पड़ता था।
  • पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि और सिंचाई को प्राथमिकता दी गई।
  • हरित क्रांति (Green Revolution, 1960s) के कारण गेहूं और चावल का उत्पादन कई गुना बढ़ा।
  • अब भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर और निर्यातक देश बन चुका है।
  1. औद्योगिक विकास
  • दूसरी पंचवर्षीय योजना से भारत ने भारी उद्योगों और मशीन निर्माण पर जोर दिया।
  • इस दौरान स्टील प्लांट (भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला) और मशीन निर्माण कारखाने स्थापित हुए।
  • धीरे-धीरे भारत में ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी प्रगति हुई।
  1. रोजगार सृजन
  • योजनाओं का एक प्रमुख उद्देश्य रोजगार देना था।
  • कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर बने।
  • IRDP, NREP, MGNREGA जैसी योजनाओं ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजगार सृजन में योगदान दिया।
  1. गरीबी में कमी
  • “गरीबी हटाओ” नारा (1970s) और बाद की योजनाओं में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम शुरू हुए।
  • गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या धीरे-धीरे घटी।
  • हालांकि, यह पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी, लेकिन इसमें सुधार हुआ।
  1. बुनियादी ढांचे का विस्तार
  • योजनाओं के माध्यम से सड़कों, रेल, बिजली, सिंचाई परियोजनाओं और शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण हुआ।
  • स्वास्थ्य सेवाओं और ग्रामीण बुनियादी ढांचे में भी सुधार आया।
  • आज भारत एशिया के सबसे बड़े सड़क नेटवर्क और मजबूत दूरसंचार प्रणाली वाला देश है।

भारत में आर्थिक नियोजन की सीमाएँ और आलोचनाएँ

हालांकि आर्थिक नियोजन से भारत ने कई उपलब्धियाँ हासिल कीं, लेकिन इसके कुछ गंभीर दोष और सीमाएँ भी सामने आईं।

  1. योजनाओं के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार और अक्षमता
  • योजनाओं का मसौदा अच्छा होता था, लेकिन अमल के दौरान भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण लक्ष्य अधूरे रह जाते थे।
  • योजनाओं में धन का दुरुपयोग और परियोजनाओं में देरी आम बात रही।
  1. क्षेत्रीय असमानताएँ बनी रहीं
  • योजनाओं का उद्देश्य क्षेत्रीय संतुलन लाना था, लेकिन व्यावहारिक रूप से कुछ राज्य (महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, तमिलनाडु) तेजी से आगे बढ़े जबकि बिहार, उड़ीसा, झारखंड जैसे राज्य पीछे रह गए।
  • इससे क्षेत्रीय असमानता की समस्या बनी रही।
  1. बेरोजगारी की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी
  • रोजगार सृजन योजनाएँ लागू हुईं, लेकिन बढ़ती जनसंख्या के कारण बेरोजगारी की समस्या कभी खत्म नहीं हो पाई।
  • खासकर ग्रामीण और शिक्षित बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती बनी रही।
  1. संसाधनों का असमान वितरण
  • योजनाओं के दौरान संसाधन और निवेश अक्सर कुछ खास क्षेत्रों या उद्योगों में केंद्रित हो गए।
  • ग्रामीण क्षेत्रों और पिछड़े इलाकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
  • इसका नतीजा यह हुआ कि सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ पूरी तरह खत्म नहीं हो सकीं।

वर्तमान परिदृश्य और नीति आयोग की भूमिका: Planning in India

योजना आयोग से नीति आयोग तक का बदलाव

1950 से 2014 तक भारत में Planning Commission (योजना आयोग) योजनाएँ बनाता और उनके क्रियान्वयन की निगरानी करता था। लेकिन समय के साथ यह आयोग केंद्रीकृत (Top-down) और कठोर हो गया। बदलती वैश्विक और राष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए 2015 में इसे समाप्त कर दिया गया और NITI Aayog (National Institution for Transforming India) की स्थापना हुई।

नीति आयोग की मुख्य भूमिका

  1. थिंक टैंक के रूप में कार्य

नीति आयोग एक थिंक टैंक की तरह काम करता है। यह सीधे योजनाएँ बनाने के बजाय सुझाव, रणनीतियाँ और नीतिगत दिशा प्रदान करता है।

  1. सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा

भारत जैसे विशाल और विविध देश में केंद्र और राज्यों का साथ मिलकर काम करना ज़रूरी है। नीति आयोग राज्यों को योजना निर्माण में सक्रिय भागीदारी देता है।

  1. सतत विकास लक्ष्य (SDGs) पर फोकस

नीति आयोग संयुक्त राष्ट्र के Sustainable Development Goals (SDGs) को हासिल करने के लिए रोडमैप बनाता है। इसमें गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे शामिल हैं।

  1. नीति सुझाव और रिपोर्ट

नीति आयोग विभिन्न क्षेत्रों (जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, रोजगार) पर रिपोर्ट जारी करता है और सरकार को सुधारात्मक सुझाव देता है। उदाहरण: Aspirational Districts Programme, जिसमें पिछड़े जिलों को तेजी से विकास की मुख्यधारा में लाने पर जोर है।

  1. नई तकनीक और नवाचार को प्रोत्साहन

नीति आयोग स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), नवीकरणीय ऊर्जा और नवाचार आधारित योजनाओं पर काम करता है।

Current Planning in India क्या है?

आज भारत में Planning in India का स्वरूप पहले से अलग है। अब कठोर पंचवर्षीय योजनाएँ नहीं बनतीं, बल्कि लचीली और दीर्घकालिक रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं।

वर्तमान नियोजन की विशेषताएँ:

  1. दीर्घकालिक लक्ष्य आधारित योजना
    – पंचवर्षीय योजनाओं की जगह अब 15 वर्षीया विजन डॉक्यूमेंट और 7 वर्षीया रणनीति पेपर बनाए जाते हैं।
    – उदाहरण: “India @75” और “India @100” जैसे दृष्टिकोण।
  2. वार्षिक कार्ययोजना (Annual Action Plan)
    – राज्यों और केंद्र के सहयोग से साल-दर-साल प्राथमिकताएँ तय की जाती हैं।
  3. सतत और समावेशी विकास
    – योजनाएँ केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समानता और तकनीकी नवाचार पर भी ध्यान देती हैं।
  4. नीति आयोग की निगरानी
    – नीति आयोग योजनाओं की प्रगति पर नजर रखता है और समय-समय पर रिपोर्ट प्रकाशित करता है।
    read more 
    https://apfcexamguide.in/economic-reforms-in-india/

    https://www.niti.gov.in/

Planning in India