Industrial Employment (Standing Orders) Act 1946: औद्योगिक रोजगार अधिनियम

Industrial Employment (Standing Orders) Act 1946 की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें। उद्देश्य, परिभाषाएँ, प्रमुख प्रावधान, संशोधन, केस लॉ और Industrial Relations Code, 2020 से संबंध सरल भाषा में समझें।”

परिचय

भारत में स्वतंत्रता से पहले श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच संबंध पूरी तरह व्यक्तिगत समझौतों पर आधारित होते थे। हर नियोक्ता अपने अनुसार शर्तें तय करता था और प्रत्येक श्रमिक का रोजगार अनुबंध दूसरे से बिल्कुल अलग होता था। इस कारण श्रमिकों के साथ मनमानी और शोषण की स्थितियाँ पैदा होती थीं।

  • श्रमिक समाज का कमजोर वर्ग माने जाते थे और उन्हें रोजगार की सुरक्षा नहीं मिलती थी।
  • नियोक्ता अपनी मनमर्जी से अलग-अलग श्रमिकों के लिए अलग नियम लागू करता था।
  • श्रमिकों को काम की शर्तों, छुट्टियों, वेतन, और अनुशासन संबंधी प्रावधानों की स्पष्ट जानकारी नहीं होती थी।

इन समस्याओं को खत्म करने के लिए औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 पारित किया गया।

अधिनियम का उद्देश्य

  • नियोक्ताओं पर यह कानूनी दायित्व डालना कि वे प्रत्येक श्रमिक को रोजगार की शर्तें लिखित और स्पष्ट रूप से बताएं।
  • रोजगार की शर्तों और नियमों में समानता लाना ताकि हर श्रमिक के लिए समान मानक लागू हों।
  • नियुक्ति, बर्खास्तगी, अनुशासनात्मक कार्यवाही, अवकाश और वेतन से जुड़ी शर्तों को सुव्यवस्थित करना।
  • औद्योगिक विवादों और श्रमिक असंतोष को कम करना।

यह अधिनियम एक तरह से श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करने वाला कानून है, जिससे श्रमिक और नियोक्ता दोनों के अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट हो जाते हैं।

Industrial Employment (Standing Orders) Act 1946

अधिनियम का लागू क्षेत्र (Section 1)

कहाँ लागू होता है?

  • यह अधिनियम उन औद्योगिक संस्थानों पर लागू होता है, जहाँ 100 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हों।
  • यदि किसी संस्थान में पिछले एक वर्ष के किसी भी दिन 100 से अधिक श्रमिक कार्यरत रहे हों, तो भी यह अधिनियम वहाँ लागू होगा।

सरकार की विशेष शक्ति

  • उपयुक्त सरकार (केंद्र या राज्य) चाहे तो दो माह की पूर्व सूचना देकर इस अधिनियम को उन संस्थानों पर भी लागू कर सकती है जहाँ 100 से कम श्रमिक हों।
  • इससे छोटे उद्योग और संस्थान भी इस कानून के दायरे में आ सकते हैं, यदि सरकार ऐसा उचित समझे।

क्यों ज़रूरी है लागू क्षेत्र को जानना?

  • क्योंकि अधिनियम की वैधता और प्रभाव केवल उन्हीं संस्थानों पर होगा जो इसके अंतर्गत आते हैं।
  • नियोक्ताओं को यह समझना जरूरी है कि उनकी संस्था इस अधिनियम के दायरे में है या नहीं, ताकि वे समय पर स्थायी आदेश (Standing Orders) तैयार कर सकें और कानूनी दंड से बच सकें।

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 का लागू क्षेत्र श्रमिकों के लिए सुरक्षा कवच की तरह है। यह केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की इच्छा से छोटे उद्योगों में भी लागू किया जा सकता है। इस अधिनियम ने भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में पारदर्शिता, समानता और श्रमिक अधिकारों की रक्षा को मजबूत आधार दिया।

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (Industrial Employment (Standing Orders) Act 1946) Section 13-B, Section 2e, Section 2b और Section 2g

कुछ संस्थानों को छूट (Section 13-B)

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 सभी औद्योगिक संस्थानों पर लागू नहीं होता। कुछ विशेष संस्थानों को इस अधिनियम से छूट दी गई है, क्योंकि उन पर पहले से ही सरकारी नियम लागू होते हैं।

किन संस्थानों को छूट है?

यह अधिनियम उन संस्थानों पर लागू नहीं होगा जिन पर निम्नलिखित नियम लागू हैं:

  1. मूलभूत और परिशिष्ट नियम (Fundamental and Supplementary Rules)
  2. सिविल सेवा नियम (Civil Service Rules) – राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए
  3. अस्थायी सेवा नियम (Temporary Service Rules)
  4. सिविल सेवा विनियम (Civil Service Regulations)
  5. रक्षा सेवाओं के लिए नागरिक नियम (Civilian Defence Service Rules)
  6. भारतीय रेल स्थापना संहिता (Indian Railway Establishment Code) और अन्य नियम जिन्हें सरकार अधिसूचित करे

 महत्वपूर्ण बात: यह छूट केवल सरकारी प्रबंधन वाले संस्थानों पर लागू होती है। यदि कोई उद्योग निजी प्रबंधन के तहत चल रहा है, तो उसे इस अधिनियम का पालन करना अनिवार्य होगा।

औद्योगिक संस्थान (Section 2e)

इस अधिनियम के अनुसार, “औद्योगिक संस्थान” (Industrial Establishment) का अर्थ है:

  1. वे संस्थान जो Payment of Wages Act, 1936 में परिभाषित हों
  2. फैक्ट्री (Factory)
  3. रेलवे (Railway)
  4. ऐसे संस्थान जो किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान से ठेका लेकर श्रमिकों को नियुक्त करते हैं

Payment of Wages Act के तहत शामिल संस्थान

  • ट्रामवे या मोटर ट्रांसपोर्ट सेवा (यात्री या माल ढुलाई के लिए)
  • हवाई परिवहन सेवा (लेकिन सैन्य या भारत सरकार की सिविल एविएशन सेवाएँ शामिल नहीं)
  • डॉक, घाट या जेट्टी
  • अंतर्देशीय यांत्रिक जहाज
  • खदान, पत्थर की खदान या तेल-क्षेत्र
  • बागान (Plantation)
  • कार्यशाला या निर्माण संस्थान (जहाँ वस्तुओं का उत्पादन या निर्माण होता हो)
  • भवन, सड़क, पुल, नहर आदि का निर्माण और रखरखाव
  • बिजली या अन्य ऊर्जा का उत्पादन, संचार और वितरण

इन सभी संस्थानों को इस अधिनियम के दायरे में रखा गया है ताकि श्रमिकों की कार्य-शर्तें समान और पारदर्शी हों।

उपयुक्त सरकार (Section 2b)

“उपयुक्त सरकार” (Appropriate Government) का निर्धारण उद्योग की प्रकृति पर निर्भर करता है।

  • केंद्र सरकार उपयुक्त सरकार होगी, यदि:
    1. उद्योग केंद्र सरकार के अधीन हो
    2. रेलवे प्रशासन हो
    3. प्रमुख बंदरगाह, खदान या तेल-क्षेत्र हो
  • राज्य सरकार उपयुक्त सरकार होगी, यदि:
    • अन्य सामान्य उद्योग और औद्योगिक संस्थान राज्य के अधीन हों।

 इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किसी भी मामले में कौन-सी सरकार नियम लागू करेगी और प्रमाणन या विवाद निपटान की जिम्मेदारी किसकी होगी।

प्रमाणित अधिकारी (Section 2c)

अधिनियम के तहत “प्रमाणित अधिकारी” (Certifying Officer) वे होते हैं जिन्हें सरकार द्वारा मसौदा स्थायी आदेश (Draft Standing Orders) को प्रमाणित करने का अधिकार दिया जाता है। इनमें शामिल हैं:

  1. श्रम आयुक्त (Labour Commissioner)
  2. क्षेत्रीय श्रम आयुक्त (Regional Labour Commissioner)
  3. सरकार द्वारा नियुक्त अन्य अधिकारी

स्थायी आदेश (Standing Orders – Section 2g)

स्थायी आदेश (Standing Orders) अधिनियम की अनुसूची में दिए गए नियमों का एक समूह है। इन्हें लागू करने का उद्देश्य श्रमिकों का शोषण रोकना और रोजगार की शर्तों को स्पष्ट करना है।

स्थायी आदेशों में शामिल विषय

  1. श्रमिकों का वर्गीकरण – स्थायी, अस्थायी, बदली श्रमिक
  2. कार्य घंटे, अवकाश और वेतन दरें
  3. शिफ्ट कार्य (Shift Working)
  4. उपस्थिति और देर से आने के नियम
  5. अवकाश और छुट्टियों के लिए आवेदन की प्रक्रिया
  6. फैक्ट्री या संस्थान में प्रवेश और तलाशी से जुड़े प्रावधान
  7. उद्योग का खुलना और बंद होना
  8. नौकरी समाप्ति और नोटिस देने की प्रक्रिया
  9. अनुशासनात्मक कार्यवाही, निलंबन या बर्खास्तगी के नियम
  10. अनुचित श्रम प्रथाओं की स्थिति में श्रमिकों के लिए उपलब्ध उपाय
  11. अन्य कोई विषय जिसे सरकार अधिसूचित करे

 स्थायी आदेशों का सबसे बड़ा महत्व यह है कि ये श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच स्पष्ट नियम और अधिकारों का ढांचा तय करते हैं।

निष्कर्ष

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 का उद्देश्य श्रमिकों की कार्य-शर्तों को मानकीकृत करना और उनके शोषण को रोकना है। Section 13-B के तहत कुछ सरकारी संस्थानों को छूट दी गई है, जबकि Section 2e यह बताता है कि किन संस्थानों को “औद्योगिक संस्थान” माना जाएगा। Section 2b उपयुक्त सरकार को परिभाषित करता है और Section 2c प्रमाणित अधिकारियों की भूमिका स्पष्ट करता है। अंततः, Section 2g स्थायी आदेशों की सूची देता है जो श्रमिक-नियोक्ता संबंधों को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाते हैं।

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (Industrial Employment (Standing Orders) Act 1946) के प्रमुख प्रावधान (Sections 3–15)

इस अधिनियम का मूल उद्देश्य है कि रोजगार की शर्तें स्पष्ट और समान हों, जिससे श्रमिकों का शोषण न हो और औद्योगिक विवाद कम हों। इसके लिए अधिनियम में Sections 3 से 15 तक विभिन्न प्रावधान दिए गए हैं।

Section 3 – मसौदा स्थायी आदेश तैयार करना

  • हर औद्योगिक संस्थान को अधिनियम लागू होने के 6 माह के भीतर अपने Draft Standing Orders (मसौदा स्थायी आदेश) तैयार करने होंगे।
  • इन आदेशों में नियुक्ति, कार्य की शर्तें, अनुशासन, अवकाश, बर्खास्तगी आदि का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
  • यह मसौदा संस्थान के प्रमाणित अधिकारी (Certifying Officer) को प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

Section 4 और Section 5 – प्रमाणन की प्रक्रिया

  • प्रमाणित अधिकारी मसौदा स्थायी आदेश की जांच करता है।
  • वह श्रमिकों और उनके प्रतिनिधियों से आपत्तियाँ (Objections) आमंत्रित कर सकता है।
  • सभी पक्षों को सुनने के बाद, यदि मसौदा उचित और न्यायसंगत है, तो अधिकारी इसे प्रमाणित (Certify) करता है।

Section 6 – अपील का अधिकार

  • अगर किसी पक्ष को प्रमाणित स्थायी आदेश से असहमति हो, तो वह 30 दिन के भीतर अपील कर सकता है।
  • अपील सुनने के लिए अपीलीय प्राधिकारी (Appellate Authority) नियुक्त होता है।

Section 7 – स्थायी आदेश का प्रभाव

  • यदि अपील न की जाए, तो स्थायी आदेश प्रमाणन की तारीख से 30 दिन बाद लागू हो जाते हैं।
  • अगर अपील लंबित है, तो आदेश अपीलीय प्राधिकारी के निर्णय के बाद लागू होंगे।

Section 8 और Section 9 – रजिस्टर और सूचना

  • सभी प्रमाणित स्थायी आदेशों को एक रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा।
  • उद्योग को इन्हें अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में अनुवाद कर प्रमुख स्थान पर चिपकाना अनिवार्य है, ताकि हर श्रमिक आसानी से पढ़ सके।

Section 10 – संशोधन (Modification)

  • स्थायी आदेश को लागू होने के 6 माह बाद संशोधित किया जा सकता है।
  • संशोधन के लिए नियोक्ता या श्रमिक दोनों ही आवेदन कर सकते हैं, लेकिन इसे पुनः प्रमाणित अधिकारी की अनुमति आवश्यक होगी।

Section 10A – निलंबन भत्ता (Subsistence Allowance)

  • अगर किसी श्रमिक को अनुशासनात्मक जांच के दौरान निलंबित किया जाता है, तो उसे भत्ता देना अनिवार्य है।
  • पहले 90 दिनों तक 50% वेतन दिया जाएगा।
  • अगर जांच 90 दिन से अधिक खिंचती है और देरी श्रमिक की गलती से नहीं हुई है, तो 75% वेतन भत्ता के रूप में देना होगा।

Section 11 – सिविल कोर्ट जैसी शक्तियाँ

  • प्रमाणित अधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियाँ प्राप्त हैं।
  • वे गवाह बुला सकते हैं, साक्ष्य ले सकते हैं और जांच कर सकते हैं।

Section 12A – मॉडल स्थायी आदेश

  • जब तक किसी संस्थान के स्थायी आदेश प्रमाणित नहीं हो जाते, तब तक सरकार द्वारा बनाए गए मॉडल स्थायी आदेश लागू होंगे।
  • इससे यह सुनिश्चित होता है कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

Section 13 – दंड (Penalty)

  • अधिनियम का पालन न करने पर नियोक्ता को ₹5000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
  • निरंतर उल्लंघन की स्थिति में ₹200 प्रतिदिन अतिरिक्त जुर्माना लगेगा।

Section 13A – विवाद का निपटारा

  • अगर स्थायी आदेश की व्याख्या (Interpretation) को लेकर विवाद हो, तो यह मामला श्रम न्यायालय (Labour Court) द्वारा निपटाया जाएगा।

Section 14A – अधिकारों का हस्तांतरण

  • केंद्र या राज्य सरकार अपने अधिकार किसी अन्य अधिकारी या प्राधिकरण को सौंप सकती है।

Section 15 – नियम बनाने की शक्ति

  • सरकार को इस अधिनियम के अंतर्गत नियम (Rules) बनाने की शक्ति है।
  • इसमें आवेदन प्रक्रिया, शुल्क, प्रमाणन प्रक्रिया, और अतिरिक्त विषय शामिल किए जा सकते हैं।

निष्कर्ष

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के Sections 3 से 15 श्रमिकों और नियोक्ताओं दोनों के अधिकार और दायित्व स्पष्ट करते हैं।

  • श्रमिकों को रोजगार की पारदर्शी शर्तें मिलती हैं।
  • नियोक्ताओं को एक व्यवस्थित प्रक्रिया का पालन करना होता है।
  • इससे उद्योगों में अनुशासन, समानता और स्थिरता आती है और औद्योगिक विवाद कम होते हैं।

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 (Industrial Employment (Standing Orders) Act 1946) Sections 3 से 15 सारांश

Section

विषय

मुख्य प्रावधान

3

मसौदा स्थायी आदेश

उद्योग को 6 माह में Draft Standing Orders तैयार कर प्रमाणित अधिकारी को देना अनिवार्य

4-5

प्रमाणन प्रक्रिया

अधिकारी मसौदे की जांच करेगा, आपत्तियाँ आमंत्रित करेगा और प्रमाणित करेगा

6

अपील

30 दिन के भीतर अपील का अधिकार

7

प्रभाव

प्रमाणन के 30 दिन बाद आदेश लागू होंगे

8-9

रजिस्टर व सूचना

स्थायी आदेश रजिस्टर में दर्ज होंगे और स्थानीय भाषा व अंग्रेजी में प्रमुख स्थान पर लगाए जाएंगे

10

संशोधन

6 माह बाद संशोधन संभव, पर प्रमाणित अधिकारी की अनुमति जरूरी

10A

निलंबन भत्ता

निलंबन की स्थिति में श्रमिक को 50% (पहले 90 दिन) और 75% (90 दिन बाद) वेतन भत्ता

11

सिविल कोर्ट जैसी शक्तियाँ

अधिकारी गवाह बुला सकता है, जांच कर सकता है

12A

मॉडल स्थायी आदेश

जब तक प्रमाणन न हो, तब तक Model Standing Orders लागू होंगे

13

दंड

अधिनियम उल्लंघन पर ₹5000 जुर्माना और ₹200 प्रतिदिन अतिरिक्त जुर्माना

13A

विवाद निपटान

स्थायी आदेश की व्याख्या से जुड़े विवाद श्रम न्यायालय निपटाएगा

14A

अधिकारों का हस्तांतरण

सरकार अपने अधिकार किसी अधिकारी या प्राधिकरण को दे सकती है

15

नियम बनाने की शक्ति

सरकार प्रक्रिया, शुल्क और नए विषयों के लिए नियम बना सकती है

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 – (Industrial Employment (Standing Orders) Act 1946) परिभाषाएँ, संशोधन, केस लॉ, सीमाएँ और वर्तमान प्रासंगिकता

धारा 2 – परिभाषाएँ (Definitions Section)

इस अधिनियम में कई महत्वपूर्ण परिभाषाएँ दी गई हैं जो इसके प्रावधानों को समझने में मदद करती हैं।

  1. Employer (नियोक्ता):
    वह व्यक्ति, प्रबंधक या प्राधिकृत अधिकारी जो किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान में श्रमिकों की नियुक्ति, सेवा शर्तें तय करने और नियंत्रण करने के लिए जिम्मेदार हो।
  2. Workman (श्रमिक):
    कोई भी व्यक्ति जो मजदूरी पर काम करता हो, चाहे वह अकुशल, अर्द्धकुशल, कुशल, तकनीकी या लिपिकीय कार्य कर रहा हो। इसमें प्रबंधकीय या प्रशासनिक पदों पर कार्यरत कर्मचारी शामिल नहीं होते।
  3. Wages (मजदूरी):
    श्रमिक को उसके रोजगार के बदले दी जाने वाली सारी पारिश्रमिक राशि। इसमें वेतन, भत्ता, ओवरटाइम और अन्य सुविधाएँ शामिल हैं, लेकिन बोनस, भविष्य निधि और ग्रेच्युटी को अलग रखा गया है।
  4. Standing Orders (स्थायी आदेश):
    अधिनियम की अनुसूची में दिए गए वे नियम जिनका उद्देश्य श्रमिकों की सेवा शर्तों को स्पष्ट और एकरूप बनाना है।

मॉडल स्थायी आदेश (Model Standing Orders – Section 12A)

जब तक किसी उद्योग के अपने स्थायी आदेश प्रमाणित नहीं हो जाते, तब तक उस उद्योग पर मॉडल स्थायी आदेश लागू होते हैं।

  • उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि श्रमिकों को न्यूनतम स्तर की सुरक्षा और अधिकार तुरंत उपलब्ध हों।
  • उदाहरण:
    • श्रमिक की वर्गीकरण नीति (स्थायी, अस्थायी, प्रशिक्षु, बदली श्रमिक)।
    • कार्य समय और शिफ्ट व्यवस्था।
    • छुट्टियों और अवकाश की प्रक्रिया।
    • अनुशासन, निलंबन और बर्खास्तगी की शर्तें।

 इससे यह सुनिश्चित होता है कि नियोक्ता मनमानी न कर सके और श्रमिकों का शोषण न हो।

प्रमुख न्यायिक व्याख्याएँ (Case Laws & Judicial Interpretations)

  1. Western India Match Company vs Workmen (1963):
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थायी आदेश का उद्देश्य श्रमिकों और नियोक्ताओं के बीच पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करना है।
  2. Bagalkot Cement Co. vs Pathan (1963):
    कोर्ट ने माना कि स्थायी आदेश बाध्यकारी होते हैं और उनके उल्लंघन की स्थिति में नियोक्ता के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
  3. Bangalore Woollen Cotton and Silk Mills vs Workmen:
    इसमें यह स्पष्ट किया गया कि स्थायी आदेश श्रमिकों की नियुक्ति से लेकर अनुशासनात्मक कार्यवाही तक हर पहलू को प्रभावित करते हैं।

अधिनियम की सीमाएँ (Criticism & Limitations)

  • यह केवल उन संस्थानों पर लागू होता है जहाँ 100 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हों। छोटे उद्योग इससे बाहर हैं।
  • कई प्रावधान आज की परिस्थितियों के अनुसार पुराने हो चुके हैं।
  • निजी उद्योगों में लचीलेपन की आवश्यकता होने के बावजूद, यह अधिनियम कभी-कभी अत्यधिक कठोर माना जाता है।
  • प्रक्रिया जटिल है और प्रमाणन की प्रक्रिया में समय लगता है।

संशोधन (Amendments in the Act)

  • 1956 और 1961: प्रक्रियात्मक बदलाव किए गए।
  • 1963 संशोधन: इसमें धारा 10A जोड़ी गई, जिसके तहत निलंबित श्रमिक को भत्ता (Subsistence Allowance) देने का प्रावधान किया गया।

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 से संबंध

भारत सरकार ने 2020 में श्रम कानूनों को सरल और आधुनिक बनाने के लिए Industrial Relations Code, 2020 पारित किया।

  • अब Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 को इस कोड में समाहित कर दिया गया है।
  • नए कोड में इसे और अधिक व्यापक, सरल और पारदर्शी बनाया गया है।
  • अब यह छोटे और बड़े दोनों उद्योगों के लिए अधिक उपयोगी है।

अधिनियम के मुख्य उद्देश्य

  1. श्रमिकों के शोषण को रोकना।
  2. सेवा शर्तों में समानता और पारदर्शिता लाना।
  3. नियोक्ता और श्रमिक के बीच विवादों को कम करना।
  4. अनुशासन और कार्यक्षमता बनाए रखना।
  5. औद्योगिक संबंधों को स्थिर और सौहार्दपूर्ण बनाना।

निष्कर्ष (Conclusion)

औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 भारतीय श्रम कानूनों में एक मील का पत्थर है। इसने पहली बार श्रमिकों के रोजगार की शर्तों को लिखित रूप में स्पष्ट और बाध्यकारी बनाया।

हालाँकि इसमें कुछ सीमाएँ थीं, लेकिन इसके कारण श्रमिकों को बुनियादी अधिकार और सुरक्षा मिली। आज यह अधिनियम Industrial Relations Code, 2020 में शामिल हो चुका है, जिससे इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।

 वर्तमान समय में, जब श्रमिकों की सुरक्षा और औद्योगिक शांति दोनों की आवश्यकता है, यह अधिनियम और इसके सिद्धांत अभी भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
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https://apfcexamguide.in/approaches-to-industrial-relations/

MCQs: औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946

प्रश्न 1. औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम किस वर्ष पारित किया गया था?
a) 1948
b) 1946
c) 1950
d) 1936
 उत्तर: b) 1946

प्रश्न 2. यह अधिनियम किन संस्थानों पर लागू होता है?
a) जहाँ 50 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हों
b) जहाँ 100 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हों
c) जहाँ 500 से अधिक श्रमिक हों
d) सभी उद्योगों पर स्वतः
 उत्तर: b) जहाँ 100 या उससे अधिक श्रमिक कार्यरत हों

प्रश्न 3. स्थायी आदेश (Standing Orders) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
a) श्रमिकों को बोनस देना
b) सेवा शर्तों को स्पष्ट और समान बनाना
c) उत्पादन क्षमता बढ़ाना
d) सरकार को राजस्व दिलाना
 उत्तर: b) सेवा शर्तों को स्पष्ट और समान बनाना

प्रश्न 4. निलंबन (Suspension) की स्थिति में Subsistence Allowance कितना होता है?
a) पहले 90 दिन तक 25% वेतन, उसके बाद 50%
b) पहले 90 दिन तक 50% वेतन, उसके बाद 75%
c) पहले 6 महीने तक पूरा वेतन
d) कोई भत्ता नहीं दिया जाता
 उत्तर: b) पहले 90 दिन तक 50% वेतन, उसके बाद 75%

प्रश्न 5. प्रमाणित अधिकारी (Certifying Officer) कौन हो सकता है?
a) श्रम आयुक्त
b) क्षेत्रीय श्रम आयुक्त
c) सरकार द्वारा नियुक्त कोई अन्य अधिकारी
d) उपरोक्त सभी
 उत्तर: d) उपरोक्त सभी

प्रश्न 6. अधिनियम की धारा 13B के अनुसार किन संस्थानों को छूट दी गई है?
a) निजी उद्योगों को
b) छोटे दुकानों और प्रतिष्ठानों को
c) सरकारी प्रबंधन वाले संस्थानों को जहाँ सिविल सेवा नियम लागू हैं
d) खदान और बागानों को
 उत्तर: c) सरकारी प्रबंधन वाले संस्थानों को जहाँ सिविल सेवा नियम लागू हैं

प्रश्न 7. स्थायी आदेश कब प्रभावी होते हैं?
a) तुरंत प्रमाणन के बाद
b) 15 दिन बाद
c) 30 दिन बाद
d) एक वर्ष बाद
 उत्तर: c) 30 दिन बाद

प्रश्न 8. Industrial Employment (Standing Orders) Act, 1946 अब किसमें समाहित हो गया है?
a) Minimum Wages Act, 1948
b) Payment of Bonus Act, 1965
c) Industrial Relations Code, 2020
d) Trade Unions Act, 1926
 उत्तर: c) Industrial Relations Code, 2020

INDUSTRIAL EMPLOYMENT (STANDING ORDERS) ACT, 1946